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Tuesday, December 30, 2014

धोनी

तुम्हारा वो अक्खड़पन ;
जेंटलमैन गेम में भी गंवई भदेश दिखना। 
क्रिकेट बस किताबों में कैद नहीं ;
देश के लाखों करोड़ों के मानस पे लिखना।
बहुत दिनों तक तुम याद रहोगे।
कई युगों तक तुम जियोगे।


Monday, December 29, 2014

कभी बेदर्द लगते हो।
कभी हमदर्द लगते हो।
मुक़र्रर करते हो सजा हमारी हिमाकत पे
मगर दर्द-ए-दिल से क्यों ज़र्द रहते हो ?

Thursday, December 4, 2014

कशिश

तुम्हारे ख्यालों में वो कशिश है कि उसमे ही 
मेरा वज़ूद गुमशुदा रहता है। 
जेहन में अक्स खींची है ऐसी तुम्हारी जैसे 
उसमे ही मेरा ख़ुदा रहता है। 

Saturday, November 29, 2014

ज़रूरतमंद

मुझे ज़िंदा रखती है
तुम्हारी हर वो बात
जो तुम मेरे विरोध में कहते हो।
और शायद तुम्हे भी
आने वाले लम्हों का स्वाद
मीठा लगता हो
मेरी कड़वी और चुभती
नज़र सानियों के बाद।
एक दूसरे की कदर
हम दोनों से बेहतर
कोई नहीं समझ सकता
क्यूँकि हम दोनों ही ज़रूरतमंद हैं
एक दूसरे के सवालों के।
आदत पड़ चुकी है हमें
एक दूसरे के दिए ज़ख्मों के।
और एक दूसरे को बर्दाश्त करते करते
अब हम एक दूसरे को सुकून देने लगे हैं।


Thursday, November 20, 2014

Fourth Dimension

मैंने अभी अभी Life ही शुरू की थी 
और तुमने Love को पा लिया। 
मैंने अभी अभी साँस ली 
और तुमने ज़िन्दगी के मायने समझा दिया। 
शायद फर्क था तुम्हारे और मेरे Fourth Dimension में 
क्यूंकि मेरा तो Cooling Down शुरू ही हुआ था
infinite years के Big Bang के बाद । 
और तुम्हारा End of Universe आ गया। 
ये तुम्हारा Gravitational Pull था 
या कोई Surface Tension का खिंचाव 
मेरे Molecules का एक एक हिस्सा तुझमे ही समा गया। 
अब मैं Matter रहूँ या Energy बन जाऊं 
तुझसे Separate न रह सकूँगा। 
तुझसे Combine होने को 
Speed of Light को भी Violate कर दूंगा।  


Wednesday, November 19, 2014

मुक्तिमार्ग

उस एक आख़िरी पल
जब कहते हैं कि
पूरी ज़िन्दगी घूम जाती है
आँखों के सामने।

हे परमात्मा !
उस पल की तस्वीर में
कोई ऐसा दाग न दिखे
जिसमे तुम्हारे अस्तित्व को
चुनौती देनी की कोशिश की हो मैंने।

मेरे सारे गुनाह
मेरी सारी खामियां
मुझे वैसे ही दिखें की मैं तुमसे डर कर
खुद को तुम्हारे आधीन कर
अपनी कमजोरियों को कबूल कर
अंजाम दे रहा हूँ।

कम से कम इतना सुकून रहे उस पल में
कि उन बिसरा देने योग्य कमज़ोर क्षणों में भी
मैं तुमसे दूर नहीं था।

और एक रोज़ जब तुमसे सामना हो मेरा
तो दोबारा क्षमा माँगना ना पड़े तुमसे।

सहर्ष सहसा तुम्हारे फैसले को
शिरोधार्य करूँगा उस रोज़ मैं।

यही मेरा मुक्तिमार्ग होगा सच में। 

Saturday, November 15, 2014

बेवजह

जब कभी यूँ हीं तन्हा बैठे
बेवजह किसी ख्याल पे।

दिल तुम्हारा दुखने लगे
बरसों पहले के सवाल पे।

जब खामोशी में भी
कोई सदा सुनायी दे।

लगे किसी ने छू लिया
यादों की परछाईं से।

हवाओं के चलने में
शाम के ढलने में।

महसूस हो किसी की मौजूदगी।
अधूरी लगे बिना उसके ज़िन्दगी।

होंठो पे बिना बात कोई
मुस्कान बिखेर दे।

बरसों पहले की उसकी याद को
दिल से निकालने को दिल न करे।

तब ऐसा लगता है मानो
इतनी दूर घसीट कर
तो कभी बहला फुसला कर
लाये हैं संग जिसे वो कोई और ही है।

क्यूंकि खुद को तो हम
वहीँ कहीं छोड़ आये हैं।



Friday, November 14, 2014

सुकून

आगंतुक !
तुम क्षितिज से फूटती 
प्रातः काल की 
रश्मि पुँज की तरह 
अलसायी अँधेरी धरती को 
ऊर्जावान कर गए। 
उसे भविष्य की 
उम्मीदों से भर गये। 
लेकिन जब तुम छोड़ गए 
अमावस के भरोसे 
तो उम्मीदों ने भी मुंह फेर लिया। 
अब रौशनी से ही डरता हूँ। 
और सुनसान अंधेरों में 
सुकून की साँसें भरता हूँ। 


Friday, September 12, 2014

ज़िन्दगी

कुछ इसे सज़ा मानते हैं ;
कुछ इसे मज़ा।

कुछ इसे फ़र्ज़ समझते हैं ;
कुछ इसे कर्ज़।

और कुछ तो इसे इस तरह जीते हैं ;
मानो औरों के लिए
मिसाल बना रहे रहे हों।

बस कुछ ही होते हैं ;
जो ज़िन्दगी को
ज़िन्दगी की तरह जीते हैं।

ना डर कर ;
ना मर कर।

ना किसी से लेकर ;
ना किसी को देकर।

बस पूरी तरह इसी के होकर। 

Sunday, September 7, 2014

तस्वीर

तड़प रहे हैं हम भी ;
तड़प रहे हैं वो भी।
जुदाई की कसक और
मिलने की तमन्ना ;
जितनी हमारी उतनी तुम्हारी।
खोल के जब दिल देखा उनका ;
ख़्वाहिश-ए-दीदार-ए-तस्वीर
जो थी उनकी ;
वही तस्वीर-ए-यार निकली हमारी।
फालतू रहा सदियों का ये जंग मेरे दोस्त।
जिन हाथों ने लिखी थी तुम्हारी किस्मत ;
उन्होंने ही बख़्शी तक़दीर हमारी। 

Saturday, September 6, 2014

करतब

जब अँधेरा था दिल में मेरे ;
खुद को कभी न परख सका। 
क्या भला क्या बुरा छिपा है ;
अपने ही भीतर नहीं दिखा। 
जब तेरी नूर समायी अंदर ;
मेरा कुछ ना सगा रहा। 
क्या अपना और कौन पराया ;
तेरा ही सब रचा लगा। 
मैं ने छोड़ा साथ मेरा तब ; 
जब तेरे हाथ का पता लगा।  
क्या क्या जोड़ रखा था मैंने ;
अब तेरे दर पे लुटा रहा। 
खुद था मैं या खुदा ही था ; 
इसका भी ना इल्म मुझे। 
अब तू मुझमे और मैं तुझमे ;
तेरे ही करतब दिखा रहा। 

Thursday, September 4, 2014

दुश्मन

दुश्मन तो मेरे अंदर ही था
और जंग लड़ता रहा मैँ
दुनिया भर से।
ज़िन्दगी भर इल्ज़ाम लगाता रहा औरों पर
गलतियां गिनता रहा लोगों की
लेकिन जब खुद के अंदर झाँका तो पाया
कि अपने ह्रदय में अन्धकार लेकर
मैं लोगों की नीयत आंकने निकला था।

Monday, September 1, 2014

माँ !

माँ !
तुम्हारी गोद में चढ़कर ऐसा लगता है
जैसे अपने दोनों हाथ बढाकर चाँद तारे छू लूँगी।
तुम्हारे होने की गरमाहट
कुछ इस तरह दिल में समा जाती है
की मुस्कान चेहरे को छोड़ने का नाम ही नहीं लेती।
तुम्हारे आँचल की छाँव ने इतना यकीन दिया कि
ज़िन्दगी में चाहे कैसी भी चिलचिलाती दुपहरी क्यों ना हो
तुम्हारे साथ की तरावट
मेरी शाम-ए-तासीर को हमेशा नम रखेगी।

Tuesday, August 26, 2014

मेरी अदालत

तय कर दिया मैंने
तमाम दुनिया की अच्छाई - बुराई
अपने ही कानून की तराजू पर तौल के।
खूब फैसले सुनाये
लोगों की नीयत पर।
उनकी फ़ितरत और आदत पर।
ये फैसले मैंने अपनी अदालत में ही सुनाये।
आरोप भी वहीँ तय किये
और दलीलें भी वहीँ दे डाली।
गुनाह गिनता रहा लोगों के
और सज़ा भी बखुबी मुक़र्रर की।
लेकिन जब खुद की पेशी हुई
औरों के दरबार में
और इल्ज़ामों का समां बंधना शुरू हुआ।
मुक़दमे गढ़े गये जब मेरे उपर।
तब इल्म हुआ की मैंने तो रिश्तों की जगह
बस अपनी राय कायम कर रखी थी।

Sunday, August 24, 2014

स्वछंदता

बचपन  में जब छत पर पतंग उड़ाया करता था।
अंतहीन आसमान में मैं भी संग उड़ता था।
इतनी आज़ादी , इतनी स्वछंदता
पूरे आसमान पर अपनी हुकूमत महसूस करता था।
आज बंद कमरों में जब रातों को
करवटें बदलता हूँ।
और मन मार कर कभी मोबाइल
तो कभी लैपटॉप पर
अनमनी उँगलियाँ फेरता हूँ।
इस छलावे में की दुनिया मेरी मुठ्ठी में है
और इस अंतर्जाल के आसमान पर
मैं स्वछन्द विचर रहा हूँ।
अपनी दासता का अनुभव तब होता है
जब "you have insufficient balance" के सन्देश के साथ 
न केवल पतंग कट जाती है 
बल्कि आसमान की ओर जाने का दरवाजा भी 
बड़ी बेशर्मी से मुँह पर ही बंद कर दिया जाता है। 
बचपन में डरते थे पतंग कटने मात्र से 
आसमान खोने की तो कल्पना भी नहीं की थी तब। 
आज आसमान भी बिकाऊ है 
और पतंग के साथ उड़ने वाला
हमारा मन भी कहीं दूर छूट चूका है। 

Thursday, August 7, 2014

अस्तित्व

कहते हैं की जो याद रहती है
वो चीज़ पुरानी हो जाती है।
मुझे याद मत रखना।
मेरी तस्वीर में
कोई रंग मत भरना।
कोरा, सादा और
जितना हो सके निराकार ;
मेरी छवि बिलकुल धुमिल रखना।
मुझे पूर्णता तुम्हारे रंगों से मिलेगी।
मेरी आवाज़ तुम्हारे छंदों से गूंजेगी।
सांस तुम लोगे और ज़िन्दगी मुझे मिलेगी।
खुश तुम होगे और मुस्कान मेरी खिलेगी।
तुम बस रहना वैसे ही
जैसे तुम सदा रहे हो-
शाश्वत और नैसर्गिक।
मेरी मौजूदगी तुम्हारे शख्शियत में
और तुम्हारा अस्तित्व फिर मेरे व्यक्तित्व में
हमेशा ज़िंदा रहेंगें।


Saturday, July 5, 2014

एकाकीपन

जहाँ रोशनी की कोई लकीर भी नहीं;
कोई जहां कभी झाँक भी न पाया;
बड़े जतन से जिसे
तुमने दुनिया से छुपाया;
तुम्हारे दिल के उस अनछुए कोने को
मैं छूना चाहता हूँ।
कितनी उम्मीदें , कितनी आशाएँ
कितना डर और कितनी शंकाएं
किसी ख़ज़ाने की तरह सहेजा है
तुमने उस अँधेरे कमरे को।
खिली धूप से भर देना चाहता हूँ
उस घनघोर अँधेरे को।
खोने के डर से
कुछ पाना ही नहीं चाहते
रोने के खौफ से
ख़ुशी में गाना नहीं चाहते
तुम्हारे उस एकाकी कमरे को
खोल देना चाहता हूँ।
जो सन्नाटा ओढ़ रखा है तुमने
काफी मुद्दतों से ;
उस वीरानगी में अपनेपन की
गूंज घोल देना चाहता हूँ।
 

Saturday, June 28, 2014

ख़ामोश सुबहें
चुपचाप शामें
बंद दरवाज़ों सी ज़िन्दगी
और झरोखों से झांकती
कितनी ही वीरान रातें।
ऐसा ही था मैं
और ऐसा ही रहूँगा।
तुमसे पहले और तुम्हारे बाद
ना कभी कह पाया
और ना ही कभी कहूँगा।
तुम्हारे उपहास को भी
उपहार जैसा गहूंगा। 

Thursday, June 5, 2014

KHUDA

थोड़ा अच्छा भी हूँ
थोड़ा ख़राब भी
ख़ुद से खुश भी हूँ
अपने से नाराज़ भी
कभी सोचता हूँ दुनिया भर की
तो कभी ख्वाहिश है बस मुट्ठी भर की
कभी नापता हूँ आसमान
तो कभी फ़िक्र अपने बसर की
ख़ौफ़ज़दा हूँ कि
कहीं बुत न बन जाए मेरा
और साँसें ही न छीन जाए मेरी
क्योंकि मुश्किल तो इन्सान बने रहने में है
वरना ख़ुदा बनने का शौक़
तो आजकल हैवानों को भी है.

Saturday, April 19, 2014

मैं कौन हूँ ?

मैं कौन हूँ ?
क्या मैं एक नाम भर हूँ ?
जिसके सहारे ये दुनिया मुझे  पुकारती है
जिसके दस्तखत से स्वीकृति मिलती है मेरी
या जिससे पहचान होती है मेरी
लेकिन ये तो मेरा नाम है, मैं तो नहीं
फिर क्या मैं एक रिश्ता भर हूँ ?
किसी का पुत्र
किसी का भाई
या किसी का कुछ और
लेकिन ये सम्बन्ध हैं मेरे, मैं तो नहीं
फिर क्या मैं एक पद का नाम हूँ ?
अमुक संस्था का पदाधिकारी
किसी संस्थान का सदस्य
या कहीं का कर्ता-धर्ता
लेकिन ये तो स्थान हैं मेरे, मैं तो नहीं
फिर क्या मैं एक हुनर भर हूँ ?
कभी एक कवि
कभी एक लेखाकार
या कभी किसी फन का जानकार
लेकिन ये सब तो कौशल हैं मेरे, मैं तो नहीं
बार-बार यही सोचता हूँ की मैं कौन हूँ ?
ये शरीर, ये सम्बन्ध, ये नाम, या ये पहचान
बार-बार यही पाता हूँ की ये सब तो "मेरे" हैं
"मैं" तो नहीं
फिर वही  सवाल रह जाता है की
मैं कौन हूँ ?

Thursday, April 17, 2014

RUKHSAT

जब कभी मुझसे दूर जाने को जी चाहे तुम्हारा
तो मुझे चोट मत पहुँचाना
मुझसे मुँह मत फेर लेना
अजनबियों की तरह
न कभी मुझसे दो-चार होने से घबराना
इन बातों से
तकलीफ होगी तुम्हे
हँसना पड़ेगा तुम्हें ऊपर-ऊपर
मगर दिल में टीस होगी तुम्हे
मैं तो चंद बेजान लफ़्ज़ों के सहारे
ज़ाहिर कर दूँगा अपनी बेबसी
लेकिन तुम्हारी बेबसी
इसका ज़िक्र भी न करने देगी तुम्हे
जब कभी मुझसे दूर जाने को जी चाहे तुम्हारा
बस एक अलविदा भर कह देना मुझसे
हँसते - हँसते
मैं भी हँसते - हँसते तुम्हे रुख़सत कर दूंगा

Wednesday, April 16, 2014

अधिकार नहीं 
अख्तयार नहीं 
तुम्हारी कल्पना के भी पहरेदार नहीं 
हम तो तुम्हारी राहों  पे बिखर जाना चाहते हैं 
तुम में विलीन होकर संवर जाना चाहते हैं