थोड़ा अच्छा भी हूँ
थोड़ा ख़राब भी
ख़ुद से खुश भी हूँ
अपने से नाराज़ भी
कभी सोचता हूँ दुनिया भर की
तो कभी ख्वाहिश है बस मुट्ठी भर की
कभी नापता हूँ आसमान
तो कभी फ़िक्र अपने बसर की
ख़ौफ़ज़दा हूँ कि
कहीं बुत न बन जाए मेरा
और साँसें ही न छीन जाए मेरी
क्योंकि मुश्किल तो इन्सान बने रहने में है
वरना ख़ुदा बनने का शौक़
तो आजकल हैवानों को भी है.
थोड़ा ख़राब भी
ख़ुद से खुश भी हूँ
अपने से नाराज़ भी
कभी सोचता हूँ दुनिया भर की
तो कभी ख्वाहिश है बस मुट्ठी भर की
कभी नापता हूँ आसमान
तो कभी फ़िक्र अपने बसर की
ख़ौफ़ज़दा हूँ कि
कहीं बुत न बन जाए मेरा
और साँसें ही न छीन जाए मेरी
क्योंकि मुश्किल तो इन्सान बने रहने में है
वरना ख़ुदा बनने का शौक़
तो आजकल हैवानों को भी है.
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