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Monday, July 22, 2019

नाकाबिले बर्दाश्त

ऐसा नहीं कि मैंने कहानी लिखने की कोशिश न की हो
या तुम्हारे वजूद की मौजूदगी को अफ़साने में पिरोना न चाहा हो
मगर हर मर्तबा कुछ ठहर सा जाता है अंदर ही अंदर
एक टीस, एक खलिश, एक चुभन
बहुत भीतर तक मानो यूँ पैबश्त हो जाती है की लकवा सा मार जाता है
तुम्हें भुला देनी की तमाम नाकाम कोशिशें और
तुम्हारी यादों को दिल में बसाये रखने की अधूरी हसरतें
ये दोनों एक साथ एक ही घर में रहती हैं
साथ साथ जीती भी हैं और एक ही साथ मरती हैं
नाकाबिले बर्दाश्त इस मंजर को मैं पीता चला जाता हूँ
वो ज़ाम समझ कर कि कहीं किसी रोज़ तो ज़हर नसीब होगा
मगर साँसें लेते रहने की सज़ा शायद अभी पूरी नहीं हुई है। 

Wednesday, June 5, 2019

भीड़

एक भीड़ से निकल कर
दूसरी भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं।
चलो फिर से एक नया किरदार ,
एक नया कथानक , एक नया किस्सा बन जाते हैं।
बोलते-बतियाते इतनी दूर चल ही लिए
चलो अपनी ख़ामोशी से भी कुछ कह जाते हैं।
एक सुकून भरी रात , तारों से पटा आसमाँ ,
तुम, मैं और कहने को बहुत कुछ
ऐसे में क्यूँ न एक दूसरे से बिना कहे
सब कुछ समझ जाते हैं।
खुशियाँ , ग़म , उम्मीद , पछतावा
और सही गलत से परे -
उस मंज़र में खुद को खोकर
फिर एक बार खुद से मिल आते हैं।
चलो न इस भीड़ से कहीं दूर
अपनी एक अलग दुनिया बनाते हैं। 

Saturday, May 25, 2019

उम्मीद

कहते हैं उम्मीद पे ही दुनिया कायम है ;
और शायद उम्मीद से ही सारे ग़म हैं।
ये उम्मीद ही तो है कि तुम आओगे ,
हाथ थाम लोगे मेरा ;
मुझको गले लगाओगे।
लेकिन जब नाउम्मीदी से घिर जाता हूँ ,
तब भी तो उम्मीद ही करता हूँ ;
कि काश! तुम्हे भुला पाता।
या शायद तुम्हें बता पता
कि अब तलक भी मैंने
उम्मीद की उस बेहद मद्धम लौ को बुझने नहीं दिया है।
बड़ी सरफिरी सी होती है उम्मीद भी।
जहाँ करो वहाँ मिलती नहीं ;
और जहाँ से मिलती है वहाँ उम्मीद नहीं होती।
शायद उम्मीद हमें यही सीखाना चाहती हो
कि उम्मीद मत पालो किसी से।
या शायद ये भी कि अपने उम्मीद पे कायम रहो।
पता नहीं , कुछ कह नहीं सकता यक़ीन से।
उम्मीद है कभी मालूम हो ही जाये ;
इसी उम्मीद पे जी लेते हैं अभी।