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Sunday, May 31, 2015

सभ्यता !

तुड़ा मुड़ा सा ;
अनगढ़ अनायास ;
और अपने में मगन सा ;
मैं अपने हिस्से की साँसे ले रहा था।
तभी तुम्हारी पैनी नज़रे पड़ी मुझपर ;
और तुम्हारे सभ्यता के ज़हरीले साँचे ने ;
मेरे वज़ूद की ऐसी तैसी कर दी।
अब मैं साँसे तो लेता हूँ ;
पर उतना ही जिससे लोगों को खलल न हो।
मेरी धड़कने अब उतना ही शोर मचाती हैं ;
जितने से समाज के मिज़ाज में दखल न हो।
बोलने पर तो तुमने कब का इख़्तियार कर ही लिया था ;
अब तो सोचता भी उतना ही हूँ की कोई हलचल न हो। 

Wednesday, May 13, 2015

विश्वास

मेरी इन पलकों के नीचे ;
जगमग से नयनों के पीछे।
ख़्वाबों ने सीखा है जीना
उम्मीदों ने साँसें ली हैं।
नयी नयी मेरी आशा को;
अपने स्नेह से तर कर देना।
कभी गिरूँ मैं जीवन में तो ;
अपने हाथ बढ़ा भर देना।
बुआ ! कल मैं बड़ी हुई तो ;
तुमसे ही ऊर्ज़ा पाऊँगी।
सपनों को कैसे जीना है ;
इसकी मिशाल और कहाँ से लाऊँगी !
छोटी सी एक बात है कहनी ;
मेरी अर्ज़ी है इतनी सी।
अपनों के साये में आकर ;
मेरे सपनें न खो जाएँ।
डरती हूँ मेरी चाहत को ;
पता नहीं कोई समझ भी पाये।
हो सके तो तुम बस इतना करना ;
मुझमे इतनी हिम्मत भरना।
मैं भी अपनी राह चुन सकूँ ;
अपने दिल की मैं भी सुन सकूँ।
वादा करती हूँ मैं तुमसे ;
कभी न तुमको रोने दूँगी।
तेरी लाडली अदिति हूँ मैं ;
विश्वास तेरा ना खोने दूँगी।