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Saturday, November 29, 2014

ज़रूरतमंद

मुझे ज़िंदा रखती है
तुम्हारी हर वो बात
जो तुम मेरे विरोध में कहते हो।
और शायद तुम्हे भी
आने वाले लम्हों का स्वाद
मीठा लगता हो
मेरी कड़वी और चुभती
नज़र सानियों के बाद।
एक दूसरे की कदर
हम दोनों से बेहतर
कोई नहीं समझ सकता
क्यूँकि हम दोनों ही ज़रूरतमंद हैं
एक दूसरे के सवालों के।
आदत पड़ चुकी है हमें
एक दूसरे के दिए ज़ख्मों के।
और एक दूसरे को बर्दाश्त करते करते
अब हम एक दूसरे को सुकून देने लगे हैं।


Thursday, November 20, 2014

Fourth Dimension

मैंने अभी अभी Life ही शुरू की थी 
और तुमने Love को पा लिया। 
मैंने अभी अभी साँस ली 
और तुमने ज़िन्दगी के मायने समझा दिया। 
शायद फर्क था तुम्हारे और मेरे Fourth Dimension में 
क्यूंकि मेरा तो Cooling Down शुरू ही हुआ था
infinite years के Big Bang के बाद । 
और तुम्हारा End of Universe आ गया। 
ये तुम्हारा Gravitational Pull था 
या कोई Surface Tension का खिंचाव 
मेरे Molecules का एक एक हिस्सा तुझमे ही समा गया। 
अब मैं Matter रहूँ या Energy बन जाऊं 
तुझसे Separate न रह सकूँगा। 
तुझसे Combine होने को 
Speed of Light को भी Violate कर दूंगा।  


Wednesday, November 19, 2014

मुक्तिमार्ग

उस एक आख़िरी पल
जब कहते हैं कि
पूरी ज़िन्दगी घूम जाती है
आँखों के सामने।

हे परमात्मा !
उस पल की तस्वीर में
कोई ऐसा दाग न दिखे
जिसमे तुम्हारे अस्तित्व को
चुनौती देनी की कोशिश की हो मैंने।

मेरे सारे गुनाह
मेरी सारी खामियां
मुझे वैसे ही दिखें की मैं तुमसे डर कर
खुद को तुम्हारे आधीन कर
अपनी कमजोरियों को कबूल कर
अंजाम दे रहा हूँ।

कम से कम इतना सुकून रहे उस पल में
कि उन बिसरा देने योग्य कमज़ोर क्षणों में भी
मैं तुमसे दूर नहीं था।

और एक रोज़ जब तुमसे सामना हो मेरा
तो दोबारा क्षमा माँगना ना पड़े तुमसे।

सहर्ष सहसा तुम्हारे फैसले को
शिरोधार्य करूँगा उस रोज़ मैं।

यही मेरा मुक्तिमार्ग होगा सच में। 

Saturday, November 15, 2014

बेवजह

जब कभी यूँ हीं तन्हा बैठे
बेवजह किसी ख्याल पे।

दिल तुम्हारा दुखने लगे
बरसों पहले के सवाल पे।

जब खामोशी में भी
कोई सदा सुनायी दे।

लगे किसी ने छू लिया
यादों की परछाईं से।

हवाओं के चलने में
शाम के ढलने में।

महसूस हो किसी की मौजूदगी।
अधूरी लगे बिना उसके ज़िन्दगी।

होंठो पे बिना बात कोई
मुस्कान बिखेर दे।

बरसों पहले की उसकी याद को
दिल से निकालने को दिल न करे।

तब ऐसा लगता है मानो
इतनी दूर घसीट कर
तो कभी बहला फुसला कर
लाये हैं संग जिसे वो कोई और ही है।

क्यूंकि खुद को तो हम
वहीँ कहीं छोड़ आये हैं।



Friday, November 14, 2014

सुकून

आगंतुक !
तुम क्षितिज से फूटती 
प्रातः काल की 
रश्मि पुँज की तरह 
अलसायी अँधेरी धरती को 
ऊर्जावान कर गए। 
उसे भविष्य की 
उम्मीदों से भर गये। 
लेकिन जब तुम छोड़ गए 
अमावस के भरोसे 
तो उम्मीदों ने भी मुंह फेर लिया। 
अब रौशनी से ही डरता हूँ। 
और सुनसान अंधेरों में 
सुकून की साँसें भरता हूँ।