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Sunday, March 29, 2015

साथ

हवा में तैरते नन्हें नन्हें ;
सतरंगी आभा में लिपटे।
हरे गुलाबी कुछ नीले से ;
बुलबुले ये चमकीले से।
ऐसे ही कुछ ख्वाब हैं मेरे ;
कितने जाने सपने मेरे।
मेरी ऑंखें भी झिलमिल हैं ;
उम्मीदें उनमें उज्जवल हैं।
नाज़ुक वो भी इनके जैसी ;
उड़ने को बिलकुल मचली सी।
बिना हवा न ये उड़ पाएंगी ;
मंज़िल से न जुड़ पाएंगी।
मृदु बयार इन्हें तुम देना ;
अदृश्य होकर भी थामे रहना।
साथ तुम्हारा मिला चले तो ;
मैं भी मंज़िल को छू लूंगी।
मेरे ह्रदय में तुम रह लेना ;
तेरे सपनों में मैं जी लूंगी।

Saturday, March 28, 2015

काम्प्लेक्स

कभी कभी तुमसे चिढ़कर ;
या ख्वामखाह ही तुमसे भिड़कर ;
मैं जान बूझकर ही ;
तुमसे नज़रे फेर लेता हूँ। 
अपनी अकड़ में अंदर के काम्प्लेक्स को
छुपाना चाहता हूँ। 
यकीन नहीं होता तुम्हारे वजूद पर इसलिए
खुद पर भरोसे को बचाना चाहता हूँ। 

Saturday, March 21, 2015

माहिर

फेसबुक की इस दीवार पर छपे
चंद लफ़्ज़ों को देखकर ;
मेरे दोस्तों को लगा कि
कितने रोशन ज़ज़्बात हैं मेरे।
कैसे बेदाग़ अल्फ़ाज़ हैं मेरे।
लोगों को लगता रहा ;
मैं अपने ख्यालों में कितना ज़ाहिर हूँ।
काश!
कोई नज़्म ये भी बता पाता कि
खुद को छुपाने में
मैं उससे भी बड़ा माहिर हूँ।

Thursday, March 19, 2015

इल्ज़ाम

एक सच तेरा भी है ;
एक हक़ीक़त मेरी भी है। 

तेरे भी हैं ख़्वाब बहुत ;
कई ज़रूरत मेरी भी हैं। 

इल्ज़ाम लगायें अबतक मुझपर ;
मुझको जी कर भी देखो। 

दिखा तुम्हें था शिकवा अपना ;
कई शिकायत मेरी भी हैं। 

Monday, March 16, 2015

किरदार

कभी जानकर ;
कभी अनजाने में।
अपनों के बीच ;
या ज़माने में।
हम दूसरों की कहानियों के
किरदार बन जाते हैं।
उनके सच-झूठ,
सही-गलत के ;
भागीदार बन जाते हैं।
हमें लगता है ;
हमने अदायगी की है
अपने फ़र्ज़ की लेकिन ;
चुकाते हैं जितना ज़्यादा ;
उतना ही कर्ज़दार बन जाते हैं। 

Sunday, March 15, 2015

रविवार

एक वो भी सुबह हुआ करती थी
जब मम्मी लगभग खीजते हुए
पूरी आवाज़ में पुकारती थी-
"रविवार की सुबह भूख प्यास भी नहीं लगती क्या ?
कम से कम खाने के लिए तो उठ जाओ बिस्तर छोड़कर।"

अब तो ये दिन भी ;
कैलेंडर के बाकी दिनों की तरह ;
मुंह चिढ़ाता है।
छुट्टी की शक्ल में आता है
और यूँ फुर्र हो जाता है ;
मानो पिछला दिन ख़त्म ही नहीं हुआ हो कभी।

वो भी दिन था कभी जब
दादी बोलती थी -
"देखो ठण्ड में कैसे चेहरा सूख गया है !
आओ कड़ुआ तेल लगा देती हूँ। "
वो ठण्ड की धूप और दादी के खुरदुरे हाथ।
आज वो सब स्वपन के समान लगते है।

ज़िन्दगी के इन रास्तों पे चलते चलते सोचता हूँ ,
ये सफर आगे ही क्यों बढ़ता है ?
कभी पाऊज़ या रिवाइंड क्यों नहीं होता ?
और अगर नहीं होता तो मेमोरी में
ये सब क्यों स्टोर रहता है ?
आने वाले दिनों में टीस देने के लिये ?

Saturday, March 7, 2015

शहादत

मुझे गिरने की आदत है।
फिर दोबारा उठने की भी आदत है।
कितनी ही बार मुझे श्रद्धांजलि दी जा चुकी
लेकिन अपनी राख़ से उठता हूँ हर बार
जब जब लिखी गयी मेरी शहादत है।



Wednesday, March 4, 2015

ख़ामोश

जुबां ख़ामोश हो गयी है।
ऑंखें पथरा गयी हैं।
कान तो कब के बहरे हो गए थे।
थोड़ी सोच ही थी जो बाकी रह गयी थी।
अब उस अक्ल पर भी पर्दा डाल दो।
इस झूठ के कफ़न को बनाये रखने के लिए
कि "सब कुछ ठीक है"
हर उस झरोखे को बंद कर दो
जिनसे होकर आने वाली हवा से
मुर्दा हो चुका सच कहीं साँसे न लेने लग जाए।
तुम बंद ही रखना हमें यूँ ही
क्यूंकि हमारे खोखलेपन में
सच्चाई को हज़म करने की कुब्बत ही नहीं रही है।