Search This Blog

Saturday, May 25, 2019

उम्मीद

कहते हैं उम्मीद पे ही दुनिया कायम है ;
और शायद उम्मीद से ही सारे ग़म हैं।
ये उम्मीद ही तो है कि तुम आओगे ,
हाथ थाम लोगे मेरा ;
मुझको गले लगाओगे।
लेकिन जब नाउम्मीदी से घिर जाता हूँ ,
तब भी तो उम्मीद ही करता हूँ ;
कि काश! तुम्हे भुला पाता।
या शायद तुम्हें बता पता
कि अब तलक भी मैंने
उम्मीद की उस बेहद मद्धम लौ को बुझने नहीं दिया है।
बड़ी सरफिरी सी होती है उम्मीद भी।
जहाँ करो वहाँ मिलती नहीं ;
और जहाँ से मिलती है वहाँ उम्मीद नहीं होती।
शायद उम्मीद हमें यही सीखाना चाहती हो
कि उम्मीद मत पालो किसी से।
या शायद ये भी कि अपने उम्मीद पे कायम रहो।
पता नहीं , कुछ कह नहीं सकता यक़ीन से।
उम्मीद है कभी मालूम हो ही जाये ;
इसी उम्मीद पे जी लेते हैं अभी।