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Saturday, February 24, 2018

सब्र का फल

मैं घूमना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ
खुले आसमाँ के नीचे
तारों भरी रात में।
समन्दर की लहरों के पीछे
धीरे-धीरे ओझल होते
सूरज को निहारना चाहता हूँ।
पहाड़ों की सुदूर चोटियों से
आभामय करते सुबह की किरण को
बिखरते देखना चाहता हूँ।
तुम्हारे सपनों के बारे में
सुनना चाहता हूँ।
अपने अरमानों के बारे में
बताना चाहता हूँ।
तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूँ ;
कि 'तुम' और 'मैं' बड़े आराम से
'हम' हो सकते हैं।
बिना एक दूजे को बाँधे भी
परवाह की जा सकती है -
ये बात समझाना चाहता हूँ।
तुम्हारी छोटी-छोटी खुशियों में
खुश होना चाहता हूँ।
तुम्हें अपने सब्र का फल
बनाना चाहता हूँ।
और कुछ नहीं
सिर्फ और सिर्फ
तुम्हें चाहता हूँ। 

Sunday, January 28, 2018

शब्द

शब्दों का ये ज़ाल है ;
कभी ख़ुशी, कभी मलाल है |
कभी सारी मुश्किलों का हल ;
तो कभी मीलों पसरा सवाल है |
कभी आज़ादी का अहसास है ;
कभी दुविधा मे अटकी साँस है |
कभी दबे पांव सरपट निकली ;
तो कभी बेबाक बिन्दास है |
कभी कभी तो ये ऐसे खोती ;
कहना हो कुछ और कुछ होती |
फिर लाख मना लो, मिन्नतें करो ;
ज़ज्बातों को धोखा देती |
पर शब्द बिना क्या बोलोगे ?
कैसे अपना दिल खोलोगे ?
ज़ज्बात मौन हो जायेंगे ;
कैसे इज़हार हो पायेंगे |
कोई हँसे, कोई परिहास करे ;
लिखता जा जो अहसाह करे |
जिस पल तू चुप हो जायेगा ;
सांसे चले पर तू मर जायेगा |
लिखना, कहना बस ज़ारी रख ;
रहे प्रखर-मुखर वो तैयारी रख |

Friday, January 26, 2018

दर्मयाँ

सुबह  की रोशनी हो या रात  की खामोशी हो ?
लब पे खिली मुस्कान या दिल मे दबी उदासी हो ?
ये जो तेरे मेरे बीच है या शायद नहीं भी है ;
ख्वाब हो , हकीक़त हो , ज़ाहिर हो या बस परछाई हो ?
किन-किन नामों से पुकारता फिरूँ तुम्हें ?
सुन भी रही हो या बस मेरे भीतर छुपी  रूबाई हो ?
कभी लगता है हाथ बढाकार छू लूँ तुम्हें इतनी पास हो  ;
फिर भी दर्मयाँ मानो बेरहम फासले, बेपनाह ऊँचाई हो !