सुबह की रोशनी हो या रात की खामोशी हो ?
लब पे खिली मुस्कान या दिल मे दबी उदासी हो ?
ये जो तेरे मेरे बीच है या शायद नहीं भी है ;
ख्वाब हो , हकीक़त हो , ज़ाहिर हो या बस परछाई हो ?
किन-किन नामों से पुकारता फिरूँ तुम्हें ?
सुन भी रही हो या बस मेरे भीतर छुपी रूबाई हो ?
कभी लगता है हाथ बढाकार छू लूँ तुम्हें इतनी पास हो ;
फिर भी दर्मयाँ मानो बेरहम फासले, बेपनाह ऊँचाई हो !
लब पे खिली मुस्कान या दिल मे दबी उदासी हो ?
ये जो तेरे मेरे बीच है या शायद नहीं भी है ;
ख्वाब हो , हकीक़त हो , ज़ाहिर हो या बस परछाई हो ?
किन-किन नामों से पुकारता फिरूँ तुम्हें ?
सुन भी रही हो या बस मेरे भीतर छुपी रूबाई हो ?
कभी लगता है हाथ बढाकार छू लूँ तुम्हें इतनी पास हो ;
फिर भी दर्मयाँ मानो बेरहम फासले, बेपनाह ऊँचाई हो !
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