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Tuesday, December 13, 2016

तृष्णा

जी भरकर था हँसना मुझको;
भर पेट था रो लेना।
आँसू से था तर हो लेना ;
आकंठ स्वपन में खो लेना।
प्रेम से था तृप्त भी होना ;
क्रोध की अग्नि से जलना।
पूर्णमेव तुमको पाना था ;
पूर्णतः तुमको खो देना।
थोड़ा थोड़ा जिया हमेशा ;
थोड़ा थोड़ा पिया किया।
एक बार ऐसा जीना है ;
एक बार ऐसा पीना।
चख़ लूँ मैं उस एक बूँद को ;
बचे ना कुछ भी जिया-पिया।


Sunday, November 20, 2016

मुकर्रर

रेल के डब्बे में सोते हुए ;
अपनों से मिलने की खुशियों में खोते हुए।
मौका था मौसी-मामा भैया-दीदी की शादी का ;
सोचा था चुरा लूँगा कुछ पल अपनी आज़ादी का।
मोहताज़ तो वैसे भी थे हम जो था कसर वो तुमने पूरा किया ;
जितना तुमने मुकर्रर किया उसमें ही गुज़ारा आधा अधूरा किया।
मग़र हाय ! समय ने हमसे वो भी छीन लिया ;
सहेज रखे थे कुछ लम्हे अपने लिए उनसे भी हमें  विहीन किया। 

Wednesday, May 25, 2016

हरगिज़

 मैं तो जानता ही था कि बिछड़ना आस पास है;
तुमसे मन जुड़ने जो लगा था।
चाह कर भी तुम्हें मंज़िल ना बना पाता हरगिज़;
तुम्हारी ओर मुड़ने जो लगा था। 

Thursday, March 31, 2016

"सेफ मार्क"

फिर कोई पुल गिरेगा ;
अपना कोई मरेगा।
फिर कहीं बम फूटेगा ;
कोई पीछे छूटेगा।
कोई दरिंदा फिर कभी ;
लोगों पे कहर बरपायेगा।
हँसता खेलता फिर कोई ;
गहरी नींद सो जायेगा।
हम घर से रोज़ निकलेंगे  ;
फिर वापस घर आयेंगे।
अपनी जान बच गयी ;
हर दिन शुकर मनायेंगे।
आज़ "सेफ मार्क" कर खुद को ;
कल फिर कूच कर जायेंगे। 

Thursday, March 3, 2016

खोज

कभी बेवजह के सवालों से;
तो कभी बेपरवाह ख्यालों से।
बिछ जाती हो मेरे आँगन में;
उजली चादर सी बाँहें पसारे।
कभी आगोश में भर लेती;
कभी ठुकरा देती गुज़ारिश सारे।
कभी बेवजह तो कभी जान बूझ कर;
बख़्श देती हो ज़न्नत या
चल देती ऑंखें मूंदकर।
ज़िन्दगी ! तुझे ढूंढता फिरता हूँ;
के एक दिन तो तुझे पाउँगा।
कभी तो मिलूँगा तुझसे;
और अपना बनाऊँगा।
मगर भूल गया इस सफर के हवश में ;
चलना है अख़्तियार पाना नहीं वश में।
हम सब तेरे ही तो हैं फिर;
तुझे कैसे अपना बनायेंगे ?
तू हमसफ़र ही है हरदम फिर;
और कहाँ तुझे पायेंगे ?