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Friday, September 12, 2014

ज़िन्दगी

कुछ इसे सज़ा मानते हैं ;
कुछ इसे मज़ा।

कुछ इसे फ़र्ज़ समझते हैं ;
कुछ इसे कर्ज़।

और कुछ तो इसे इस तरह जीते हैं ;
मानो औरों के लिए
मिसाल बना रहे रहे हों।

बस कुछ ही होते हैं ;
जो ज़िन्दगी को
ज़िन्दगी की तरह जीते हैं।

ना डर कर ;
ना मर कर।

ना किसी से लेकर ;
ना किसी को देकर।

बस पूरी तरह इसी के होकर। 

Sunday, September 7, 2014

तस्वीर

तड़प रहे हैं हम भी ;
तड़प रहे हैं वो भी।
जुदाई की कसक और
मिलने की तमन्ना ;
जितनी हमारी उतनी तुम्हारी।
खोल के जब दिल देखा उनका ;
ख़्वाहिश-ए-दीदार-ए-तस्वीर
जो थी उनकी ;
वही तस्वीर-ए-यार निकली हमारी।
फालतू रहा सदियों का ये जंग मेरे दोस्त।
जिन हाथों ने लिखी थी तुम्हारी किस्मत ;
उन्होंने ही बख़्शी तक़दीर हमारी। 

Saturday, September 6, 2014

करतब

जब अँधेरा था दिल में मेरे ;
खुद को कभी न परख सका। 
क्या भला क्या बुरा छिपा है ;
अपने ही भीतर नहीं दिखा। 
जब तेरी नूर समायी अंदर ;
मेरा कुछ ना सगा रहा। 
क्या अपना और कौन पराया ;
तेरा ही सब रचा लगा। 
मैं ने छोड़ा साथ मेरा तब ; 
जब तेरे हाथ का पता लगा।  
क्या क्या जोड़ रखा था मैंने ;
अब तेरे दर पे लुटा रहा। 
खुद था मैं या खुदा ही था ; 
इसका भी ना इल्म मुझे। 
अब तू मुझमे और मैं तुझमे ;
तेरे ही करतब दिखा रहा। 

Thursday, September 4, 2014

दुश्मन

दुश्मन तो मेरे अंदर ही था
और जंग लड़ता रहा मैँ
दुनिया भर से।
ज़िन्दगी भर इल्ज़ाम लगाता रहा औरों पर
गलतियां गिनता रहा लोगों की
लेकिन जब खुद के अंदर झाँका तो पाया
कि अपने ह्रदय में अन्धकार लेकर
मैं लोगों की नीयत आंकने निकला था।

Monday, September 1, 2014

माँ !

माँ !
तुम्हारी गोद में चढ़कर ऐसा लगता है
जैसे अपने दोनों हाथ बढाकर चाँद तारे छू लूँगी।
तुम्हारे होने की गरमाहट
कुछ इस तरह दिल में समा जाती है
की मुस्कान चेहरे को छोड़ने का नाम ही नहीं लेती।
तुम्हारे आँचल की छाँव ने इतना यकीन दिया कि
ज़िन्दगी में चाहे कैसी भी चिलचिलाती दुपहरी क्यों ना हो
तुम्हारे साथ की तरावट
मेरी शाम-ए-तासीर को हमेशा नम रखेगी।