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Saturday, September 6, 2014

करतब

जब अँधेरा था दिल में मेरे ;
खुद को कभी न परख सका। 
क्या भला क्या बुरा छिपा है ;
अपने ही भीतर नहीं दिखा। 
जब तेरी नूर समायी अंदर ;
मेरा कुछ ना सगा रहा। 
क्या अपना और कौन पराया ;
तेरा ही सब रचा लगा। 
मैं ने छोड़ा साथ मेरा तब ; 
जब तेरे हाथ का पता लगा।  
क्या क्या जोड़ रखा था मैंने ;
अब तेरे दर पे लुटा रहा। 
खुद था मैं या खुदा ही था ; 
इसका भी ना इल्म मुझे। 
अब तू मुझमे और मैं तुझमे ;
तेरे ही करतब दिखा रहा। 

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