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Sunday, December 6, 2015

गुमाँ

आज तुमने फिर से ;
उसी पुरानी शिद्दत के साथ ;
मेरे ख्यालों के कैनवस पे घिर के।
अपनी छवि से मुझे ;
सराबोर कर दिया है।
जितनी ही बार ये गुमाँ होता है ;
कि अब तुम्हारा वज़ूद ;
मर गया मेरे अंदर।
उतनी ही बार ज़ाहिर होते हो ;
नयी शक्ल लेकर।
कभी आँसू बनकर भी ;
आँखों में ही जज़्ब हो जाते हो।
तो कभी लफ़्ज़ों में ढलकर भी ;
ज़ुबाँ के अंदर ही दम तोड़ देते हो।
तो कभी यूँ ही वीरान शामों में ;
आसमाँ पर खिंच जाते हो ;
उस टिमटिमाते तारे की तरह -
जो बस अपने होने का ;
एहसास भर करा सकता है।
 

Wednesday, September 16, 2015

अन्यत्र

आज हम निकले ;
अपने घर से ;
ज़िंदगी ढूँढने।
सोचा मिले तो पूछूँगा -
क्या ख़ता हुई ;
जो यूँ ख़फ़ा हो मुझसे।
तमाम रास्ते तय किये ;
ये सोचकर -
कि कहीं तो बैठी होगी ;
मेरे इंतेज़ार में।
मनाऊँगा उसे इतना ;
कि पिघल जायेगी ;
मेरे मनुहार में।
जब शाम हो गयी ;
और हौसले भी थक गए।
लड़खड़ा गए हम ;
और कदम भी रुक गये।
निराश होकर उलटे कदमों से ;
लौट चले हम अपने घर को।
खाली हाथ लौटने लगे ;
निहारते गोधूली के अम्बर को।
जब घर पहुँचे तो ;
दिवावसान के उस समय में।
अपने ही घर के ;
उस अनछुए,
अनदेखे कोने में।
ज़िन्दगी मिली -
अपनी आख़िरी साँसें लेती हुई।
बोली कब से मैं तुम्हारा इंतेज़ार ;
इसी कोने में करती रही।
तलाशते रहे तुम मुझे अन्यत्र
और मैं तुम्हारे ही घर में मरती रही। 

Monday, September 14, 2015

चिंगारी

बेज़ान है, इत्मीनान है ;
फिर भी बेकरारी बाकी है।
राख़ हो गया हूँ भीतर तक ;
कहीं इक चिंगारी बाकी है। 

Tuesday, September 8, 2015

त्याग

क्षितिज में सिमटता सूरज ;
मानो एक बिंदु मात्र -
अपने अस्तित्व को खोता हुआ।
अपनी विशालता को पाकर ;
फिर उसी विशाल में विलीन होता हुआ।
यही कह रहा हो कि ;
भले ही उपलब्धि हो ;
ऊँचाई प्राप्त कर लेने में।
लेकिन मुक्ति तो ;
उस ऊंचाई को त्याग देने में ही है।
 

Friday, July 17, 2015

ज़ंग

हरेक रात को खुद में ;
सपनों को ज़िंदा होते देखता हूँ।
साँसें भरते,
फलते-फूलते और
आसमान में उड़ते भी देखता हूँ।
फिर दिन के कठोर हाथ
उन सपनों का गला घोंट देते हैं।
कभी दोबारा उड़ने को पर न फैला सकें ;
इतनी बेरहम चोट देते हैं।
कैसी कश्मकश है कि जिसमे
कभी हसरतों के सामने
हकीक़त घुटने टेकती है;
तो कभी दो जून की रोटी से
ख्वाबों की चमक हार जाती है।
कौन सी ज़ंग छिड़ गयी है भीतर कि
कभी शिक़स्त भी फ़तह लगती है ;
तो कभी जीत कर भी मायूसी छा जाती है। 

Sunday, May 31, 2015

सभ्यता !

तुड़ा मुड़ा सा ;
अनगढ़ अनायास ;
और अपने में मगन सा ;
मैं अपने हिस्से की साँसे ले रहा था।
तभी तुम्हारी पैनी नज़रे पड़ी मुझपर ;
और तुम्हारे सभ्यता के ज़हरीले साँचे ने ;
मेरे वज़ूद की ऐसी तैसी कर दी।
अब मैं साँसे तो लेता हूँ ;
पर उतना ही जिससे लोगों को खलल न हो।
मेरी धड़कने अब उतना ही शोर मचाती हैं ;
जितने से समाज के मिज़ाज में दखल न हो।
बोलने पर तो तुमने कब का इख़्तियार कर ही लिया था ;
अब तो सोचता भी उतना ही हूँ की कोई हलचल न हो। 

Wednesday, May 13, 2015

विश्वास

मेरी इन पलकों के नीचे ;
जगमग से नयनों के पीछे।
ख़्वाबों ने सीखा है जीना
उम्मीदों ने साँसें ली हैं।
नयी नयी मेरी आशा को;
अपने स्नेह से तर कर देना।
कभी गिरूँ मैं जीवन में तो ;
अपने हाथ बढ़ा भर देना।
बुआ ! कल मैं बड़ी हुई तो ;
तुमसे ही ऊर्ज़ा पाऊँगी।
सपनों को कैसे जीना है ;
इसकी मिशाल और कहाँ से लाऊँगी !
छोटी सी एक बात है कहनी ;
मेरी अर्ज़ी है इतनी सी।
अपनों के साये में आकर ;
मेरे सपनें न खो जाएँ।
डरती हूँ मेरी चाहत को ;
पता नहीं कोई समझ भी पाये।
हो सके तो तुम बस इतना करना ;
मुझमे इतनी हिम्मत भरना।
मैं भी अपनी राह चुन सकूँ ;
अपने दिल की मैं भी सुन सकूँ।
वादा करती हूँ मैं तुमसे ;
कभी न तुमको रोने दूँगी।
तेरी लाडली अदिति हूँ मैं ;
विश्वास तेरा ना खोने दूँगी।

Sunday, March 29, 2015

साथ

हवा में तैरते नन्हें नन्हें ;
सतरंगी आभा में लिपटे।
हरे गुलाबी कुछ नीले से ;
बुलबुले ये चमकीले से।
ऐसे ही कुछ ख्वाब हैं मेरे ;
कितने जाने सपने मेरे।
मेरी ऑंखें भी झिलमिल हैं ;
उम्मीदें उनमें उज्जवल हैं।
नाज़ुक वो भी इनके जैसी ;
उड़ने को बिलकुल मचली सी।
बिना हवा न ये उड़ पाएंगी ;
मंज़िल से न जुड़ पाएंगी।
मृदु बयार इन्हें तुम देना ;
अदृश्य होकर भी थामे रहना।
साथ तुम्हारा मिला चले तो ;
मैं भी मंज़िल को छू लूंगी।
मेरे ह्रदय में तुम रह लेना ;
तेरे सपनों में मैं जी लूंगी।

Saturday, March 28, 2015

काम्प्लेक्स

कभी कभी तुमसे चिढ़कर ;
या ख्वामखाह ही तुमसे भिड़कर ;
मैं जान बूझकर ही ;
तुमसे नज़रे फेर लेता हूँ। 
अपनी अकड़ में अंदर के काम्प्लेक्स को
छुपाना चाहता हूँ। 
यकीन नहीं होता तुम्हारे वजूद पर इसलिए
खुद पर भरोसे को बचाना चाहता हूँ। 

Saturday, March 21, 2015

माहिर

फेसबुक की इस दीवार पर छपे
चंद लफ़्ज़ों को देखकर ;
मेरे दोस्तों को लगा कि
कितने रोशन ज़ज़्बात हैं मेरे।
कैसे बेदाग़ अल्फ़ाज़ हैं मेरे।
लोगों को लगता रहा ;
मैं अपने ख्यालों में कितना ज़ाहिर हूँ।
काश!
कोई नज़्म ये भी बता पाता कि
खुद को छुपाने में
मैं उससे भी बड़ा माहिर हूँ।

Thursday, March 19, 2015

इल्ज़ाम

एक सच तेरा भी है ;
एक हक़ीक़त मेरी भी है। 

तेरे भी हैं ख़्वाब बहुत ;
कई ज़रूरत मेरी भी हैं। 

इल्ज़ाम लगायें अबतक मुझपर ;
मुझको जी कर भी देखो। 

दिखा तुम्हें था शिकवा अपना ;
कई शिकायत मेरी भी हैं। 

Monday, March 16, 2015

किरदार

कभी जानकर ;
कभी अनजाने में।
अपनों के बीच ;
या ज़माने में।
हम दूसरों की कहानियों के
किरदार बन जाते हैं।
उनके सच-झूठ,
सही-गलत के ;
भागीदार बन जाते हैं।
हमें लगता है ;
हमने अदायगी की है
अपने फ़र्ज़ की लेकिन ;
चुकाते हैं जितना ज़्यादा ;
उतना ही कर्ज़दार बन जाते हैं। 

Sunday, March 15, 2015

रविवार

एक वो भी सुबह हुआ करती थी
जब मम्मी लगभग खीजते हुए
पूरी आवाज़ में पुकारती थी-
"रविवार की सुबह भूख प्यास भी नहीं लगती क्या ?
कम से कम खाने के लिए तो उठ जाओ बिस्तर छोड़कर।"

अब तो ये दिन भी ;
कैलेंडर के बाकी दिनों की तरह ;
मुंह चिढ़ाता है।
छुट्टी की शक्ल में आता है
और यूँ फुर्र हो जाता है ;
मानो पिछला दिन ख़त्म ही नहीं हुआ हो कभी।

वो भी दिन था कभी जब
दादी बोलती थी -
"देखो ठण्ड में कैसे चेहरा सूख गया है !
आओ कड़ुआ तेल लगा देती हूँ। "
वो ठण्ड की धूप और दादी के खुरदुरे हाथ।
आज वो सब स्वपन के समान लगते है।

ज़िन्दगी के इन रास्तों पे चलते चलते सोचता हूँ ,
ये सफर आगे ही क्यों बढ़ता है ?
कभी पाऊज़ या रिवाइंड क्यों नहीं होता ?
और अगर नहीं होता तो मेमोरी में
ये सब क्यों स्टोर रहता है ?
आने वाले दिनों में टीस देने के लिये ?

Saturday, March 7, 2015

शहादत

मुझे गिरने की आदत है।
फिर दोबारा उठने की भी आदत है।
कितनी ही बार मुझे श्रद्धांजलि दी जा चुकी
लेकिन अपनी राख़ से उठता हूँ हर बार
जब जब लिखी गयी मेरी शहादत है।



Wednesday, March 4, 2015

ख़ामोश

जुबां ख़ामोश हो गयी है।
ऑंखें पथरा गयी हैं।
कान तो कब के बहरे हो गए थे।
थोड़ी सोच ही थी जो बाकी रह गयी थी।
अब उस अक्ल पर भी पर्दा डाल दो।
इस झूठ के कफ़न को बनाये रखने के लिए
कि "सब कुछ ठीक है"
हर उस झरोखे को बंद कर दो
जिनसे होकर आने वाली हवा से
मुर्दा हो चुका सच कहीं साँसे न लेने लग जाए।
तुम बंद ही रखना हमें यूँ ही
क्यूंकि हमारे खोखलेपन में
सच्चाई को हज़म करने की कुब्बत ही नहीं रही है। 

Monday, January 19, 2015

अर्जित

ख़ाली ख़ाली से कोरे से 
इस काग़ज़ पर लिख जाता हूँ। 
कुछ सोच समझ 
कुछ बिन समझे 
फिर शीघ्र इन्हें मिटाता हूँ। 
ख़ुद को भरना था बहुत कठिन। 
पर उससे भी था ये दुष्कर ;
कैसे मैं स्वयं को रिक्त करूँ। 
जो था अर्जित उससे मुक्त करूँ। 
पर जब तक मैं न खोऊँगा ;
तुम बोलो कैसे पाऊँगा ?

Friday, January 16, 2015

बेरहम ?

जब इन लहरों को देखता हूँ
किनारे के पत्थरों पर
थपेड़े मारते हुए ;
अपने वज़ूद को भुलाकर
फ़ना हो जाते हुए ;
फिर से सागर में ग़ुम होकर
दोबारा उसी शिद्दत के साथ
खुद को समेट कर ;
अपने उस सख़्त और बेरहम
साथी में समा जाने के लिए
बार बार खुद को मिटाते हुए।
तो लगता है जैसे इन दोनों का मुक़ाम ही यही है।
एक टूटकर नयी ज़िन्दगी पाता है।
एक तोड़कर खुद ही बिखर सा जाता है।

Wednesday, January 14, 2015

अकेला

मैं ये उम्मीद कतई नहीं रखता
की तुम समझ सकोगे मुझे-
मेरे सपनों को ;
मेरे खौफ को
और मेरे अंदर छुपे उस
गहरे सन्नाटे को।
तुम महसूस ही नहीं कर पाओगे -
कहीं मेरे अंदर बहुत भीतर दबी
मेरे बीते कल की अँधेरी यादों को
और चुभने वाले उन जज़्बातों को।
अपनी आदत के परदे को हटाकर
अपनी आँखों से फैसले
के मैल को हटाकर जिसदिन देखोगे
उस दिन शायद तुम देख पाओ
की मैं कितना अकेला था।

Friday, January 9, 2015

उम्मीद

तुम मेरी वो उम्मीद हो
जिसका हाथ थाम कर
मैं उस पार तक जाना चाहता हूँ।
तुम मेरी वो तलाश हो
जिसको हासिल करने के लिए
मैं खुद को भी खो देना चाहता हूँ।
तुम मेरा वो ख़्वाब हो
जिसको जीने के लिए मैं
हक़ीक़त से भी मुँह मोड़ लेना चाहता हूँ।
तुम मेरा वो गुनाह हो
जिसे अंजाम देने के लिए मैं
कितनी ही बार सज़ा पाना चाहता हूँ।

Thursday, January 8, 2015

तलाश

इस आग़ाज़ को अंज़ाम देना चाहता है ;
दिल ये तुझको पैग़ाम देना चाहता है। 
तुम न मिले तो फिर अधूरा ही रह जाऊँगा ;
ख़ुद को एक मुकम्मल आयाम देना चाहता है।
जाने कब से तुम्हारी ही तलाश थी दिल को ;
इस एहसास को एक नाम देना चाहता है।