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Friday, July 17, 2015

ज़ंग

हरेक रात को खुद में ;
सपनों को ज़िंदा होते देखता हूँ।
साँसें भरते,
फलते-फूलते और
आसमान में उड़ते भी देखता हूँ।
फिर दिन के कठोर हाथ
उन सपनों का गला घोंट देते हैं।
कभी दोबारा उड़ने को पर न फैला सकें ;
इतनी बेरहम चोट देते हैं।
कैसी कश्मकश है कि जिसमे
कभी हसरतों के सामने
हकीक़त घुटने टेकती है;
तो कभी दो जून की रोटी से
ख्वाबों की चमक हार जाती है।
कौन सी ज़ंग छिड़ गयी है भीतर कि
कभी शिक़स्त भी फ़तह लगती है ;
तो कभी जीत कर भी मायूसी छा जाती है। 

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