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Sunday, May 31, 2015

सभ्यता !

तुड़ा मुड़ा सा ;
अनगढ़ अनायास ;
और अपने में मगन सा ;
मैं अपने हिस्से की साँसे ले रहा था।
तभी तुम्हारी पैनी नज़रे पड़ी मुझपर ;
और तुम्हारे सभ्यता के ज़हरीले साँचे ने ;
मेरे वज़ूद की ऐसी तैसी कर दी।
अब मैं साँसे तो लेता हूँ ;
पर उतना ही जिससे लोगों को खलल न हो।
मेरी धड़कने अब उतना ही शोर मचाती हैं ;
जितने से समाज के मिज़ाज में दखल न हो।
बोलने पर तो तुमने कब का इख़्तियार कर ही लिया था ;
अब तो सोचता भी उतना ही हूँ की कोई हलचल न हो। 

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