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Saturday, August 5, 2017

थी कोई

थी कोई ;
जिसके इंतज़ार में
पलकें झपकना भूल जाया करती थीं।
और हरेक आहट पर
दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती थी।
थी कोई ;
जिसकी मुस्कराहटों में
हम तमाम ज़िन्दगी ढूँढ लिया करते थे।
और जिसकी आँसुओं की एक बूँद में
कभी हमारा वज़ूद डूब जाता था।
थी कोई ;
जिसके ख़यालों की
बेचैनी में सुकून भी था।
और जुबाँ की ख़ामोशी में
उसका ज़िक्र भी था।
थी कोई ;
जिसकी मौज़ूदगी में
हम खुद से जुदा हुआ करते थे।
और उसकी गुमशुदगी में
अब खुद को तलाशा करते हैं। 

Monday, July 17, 2017

ख़ुदा


कहीं भीतर ही भीतर एक सर्द कोने में
मायूसी में सिमटे अरमानों को ;
अपनी इक आवाज़ की तपिश भर से ;
नया परवान चढ़ाती है।
जो कब का जीना भूल गया उस दिल को ;
साँसों से सराबोर कर जाती है।
ख़ुद को तलाश पाने की जाती उम्मीद में ;
मेरे वज़ूद को फिर से ज़िंदा कर जाती है।
पता नहीं अब तक कहाँ ढूंढ़ रहा था ;
तुम्हारे ख्याल भर ख़ुदा का एहसास करा जाती है। 

Monday, March 6, 2017

काँटा

मैंने कभी ज़्यादा तरी नहीं चाही।
कोई प्यार से छू ले मुझे ;
या मेरे धूप-छाँव का ख़्याल रखे ;
ऐसी ना तो तलब ही हुई ;
ना कभी उम्मीद ही ज़ाहिर की।
लोगों ने मुझे उजाड़ना ही सीखा ;
अपने आँगन के कोने में क्या जगह देते ?
ज़मीन के जिस टुकड़े पर ;
कभी एक दाना भी नहीं फला।
जहाँ दुर्बा की एक कोंपल भी ;
उगने की कल्पना से काँप जाती।
ऐसी बंजर, बेकार और वाहियात
जगह में मेरा वजूद पलता रहा।
फिर भी जाने क्यूँ मैं
लोगों की आँखों में चुभ जाता हूँ ?
जाने क्यूँ मेरा अस्तित्व
परेशानी का सबब बन जाता है ?
बस एक बात समझ नहीं आती-
दिक्कत "काँटों" की मौजूदगी से है ;
या उनकी बेपरवाही से ? 

Thursday, January 5, 2017

"पाप"

तुमसे हर कड़वा मीठा था ;
हारा भी जीत सरीखा था।
संग तेरे जन्नत गलियाँ थीं ;
चंद सिक्कों में रंगरलियाँ थीं।
अब ज़ेबें मेरी भरी हुई ;
पर उम्मीदें हैं मरी हुई।
झगड़ा भी तुमसे करते थे ;
जी-जान से तुमपे मरते थे।
ख्वाबों में तेरी सोते थे ;
औक़ात में अपनी होते थे।
तब "पाप" भी प्यारा होता था ;
हर ज़र्रा तारा होता था।