मैंने कभी ज़्यादा तरी नहीं चाही।
कोई प्यार से छू ले मुझे ;
या मेरे धूप-छाँव का ख़्याल रखे ;
ऐसी ना तो तलब ही हुई ;
ना कभी उम्मीद ही ज़ाहिर की।
लोगों ने मुझे उजाड़ना ही सीखा ;
अपने आँगन के कोने में क्या जगह देते ?
ज़मीन के जिस टुकड़े पर ;
कभी एक दाना भी नहीं फला।
जहाँ दुर्बा की एक कोंपल भी ;
उगने की कल्पना से काँप जाती।
ऐसी बंजर, बेकार और वाहियात
जगह में मेरा वजूद पलता रहा।
फिर भी जाने क्यूँ मैं
लोगों की आँखों में चुभ जाता हूँ ?
जाने क्यूँ मेरा अस्तित्व
परेशानी का सबब बन जाता है ?
बस एक बात समझ नहीं आती-
दिक्कत "काँटों" की मौजूदगी से है ;
या उनकी बेपरवाही से ?
कोई प्यार से छू ले मुझे ;
या मेरे धूप-छाँव का ख़्याल रखे ;
ऐसी ना तो तलब ही हुई ;
ना कभी उम्मीद ही ज़ाहिर की।
लोगों ने मुझे उजाड़ना ही सीखा ;
अपने आँगन के कोने में क्या जगह देते ?
ज़मीन के जिस टुकड़े पर ;
कभी एक दाना भी नहीं फला।
जहाँ दुर्बा की एक कोंपल भी ;
उगने की कल्पना से काँप जाती।
ऐसी बंजर, बेकार और वाहियात
जगह में मेरा वजूद पलता रहा।
फिर भी जाने क्यूँ मैं
लोगों की आँखों में चुभ जाता हूँ ?
जाने क्यूँ मेरा अस्तित्व
परेशानी का सबब बन जाता है ?
बस एक बात समझ नहीं आती-
दिक्कत "काँटों" की मौजूदगी से है ;
या उनकी बेपरवाही से ?
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