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Saturday, June 28, 2014

ख़ामोश सुबहें
चुपचाप शामें
बंद दरवाज़ों सी ज़िन्दगी
और झरोखों से झांकती
कितनी ही वीरान रातें।
ऐसा ही था मैं
और ऐसा ही रहूँगा।
तुमसे पहले और तुम्हारे बाद
ना कभी कह पाया
और ना ही कभी कहूँगा।
तुम्हारे उपहास को भी
उपहार जैसा गहूंगा। 

Thursday, June 5, 2014

KHUDA

थोड़ा अच्छा भी हूँ
थोड़ा ख़राब भी
ख़ुद से खुश भी हूँ
अपने से नाराज़ भी
कभी सोचता हूँ दुनिया भर की
तो कभी ख्वाहिश है बस मुट्ठी भर की
कभी नापता हूँ आसमान
तो कभी फ़िक्र अपने बसर की
ख़ौफ़ज़दा हूँ कि
कहीं बुत न बन जाए मेरा
और साँसें ही न छीन जाए मेरी
क्योंकि मुश्किल तो इन्सान बने रहने में है
वरना ख़ुदा बनने का शौक़
तो आजकल हैवानों को भी है.