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Saturday, June 28, 2014

ख़ामोश सुबहें
चुपचाप शामें
बंद दरवाज़ों सी ज़िन्दगी
और झरोखों से झांकती
कितनी ही वीरान रातें।
ऐसा ही था मैं
और ऐसा ही रहूँगा।
तुमसे पहले और तुम्हारे बाद
ना कभी कह पाया
और ना ही कभी कहूँगा।
तुम्हारे उपहास को भी
उपहार जैसा गहूंगा। 

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