तय कर दिया मैंने
तमाम दुनिया की अच्छाई - बुराईअपने ही कानून की तराजू पर तौल के।
खूब फैसले सुनाये
लोगों की नीयत पर।
उनकी फ़ितरत और आदत पर।
ये फैसले मैंने अपनी अदालत में ही सुनाये।
आरोप भी वहीँ तय किये
और दलीलें भी वहीँ दे डाली।
गुनाह गिनता रहा लोगों के
और सज़ा भी बखुबी मुक़र्रर की।
लेकिन जब खुद की पेशी हुई
औरों के दरबार में
और इल्ज़ामों का समां बंधना शुरू हुआ।
मुक़दमे गढ़े गये जब मेरे उपर।
तब इल्म हुआ की मैंने तो रिश्तों की जगह
बस अपनी राय कायम कर रखी थी।