बचपन में जब छत पर पतंग उड़ाया करता था।
अंतहीन आसमान में मैं भी संग उड़ता था।
इतनी आज़ादी , इतनी स्वछंदता
पूरे आसमान पर अपनी हुकूमत महसूस करता था।
आज बंद कमरों में जब रातों को
करवटें बदलता हूँ।
और मन मार कर कभी मोबाइल
तो कभी लैपटॉप पर
अनमनी उँगलियाँ फेरता हूँ।
इस छलावे में की दुनिया मेरी मुठ्ठी में है
और इस अंतर्जाल के आसमान पर
मैं स्वछन्द विचर रहा हूँ।
अपनी दासता का अनुभव तब होता है
अंतहीन आसमान में मैं भी संग उड़ता था।
इतनी आज़ादी , इतनी स्वछंदता
पूरे आसमान पर अपनी हुकूमत महसूस करता था।
आज बंद कमरों में जब रातों को
करवटें बदलता हूँ।
और मन मार कर कभी मोबाइल
तो कभी लैपटॉप पर
अनमनी उँगलियाँ फेरता हूँ।
इस छलावे में की दुनिया मेरी मुठ्ठी में है
और इस अंतर्जाल के आसमान पर
मैं स्वछन्द विचर रहा हूँ।
अपनी दासता का अनुभव तब होता है
जब "you have insufficient balance" के सन्देश के साथ
न केवल पतंग कट जाती है
बल्कि आसमान की ओर जाने का दरवाजा भी
बड़ी बेशर्मी से मुँह पर ही बंद कर दिया जाता है।
बचपन में डरते थे पतंग कटने मात्र से
आसमान खोने की तो कल्पना भी नहीं की थी तब।
आज आसमान भी बिकाऊ है
और पतंग के साथ उड़ने वाला
हमारा मन भी कहीं दूर छूट चूका है।
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