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Monday, January 19, 2015

अर्जित

ख़ाली ख़ाली से कोरे से 
इस काग़ज़ पर लिख जाता हूँ। 
कुछ सोच समझ 
कुछ बिन समझे 
फिर शीघ्र इन्हें मिटाता हूँ। 
ख़ुद को भरना था बहुत कठिन। 
पर उससे भी था ये दुष्कर ;
कैसे मैं स्वयं को रिक्त करूँ। 
जो था अर्जित उससे मुक्त करूँ। 
पर जब तक मैं न खोऊँगा ;
तुम बोलो कैसे पाऊँगा ?

Friday, January 16, 2015

बेरहम ?

जब इन लहरों को देखता हूँ
किनारे के पत्थरों पर
थपेड़े मारते हुए ;
अपने वज़ूद को भुलाकर
फ़ना हो जाते हुए ;
फिर से सागर में ग़ुम होकर
दोबारा उसी शिद्दत के साथ
खुद को समेट कर ;
अपने उस सख़्त और बेरहम
साथी में समा जाने के लिए
बार बार खुद को मिटाते हुए।
तो लगता है जैसे इन दोनों का मुक़ाम ही यही है।
एक टूटकर नयी ज़िन्दगी पाता है।
एक तोड़कर खुद ही बिखर सा जाता है।

Wednesday, January 14, 2015

अकेला

मैं ये उम्मीद कतई नहीं रखता
की तुम समझ सकोगे मुझे-
मेरे सपनों को ;
मेरे खौफ को
और मेरे अंदर छुपे उस
गहरे सन्नाटे को।
तुम महसूस ही नहीं कर पाओगे -
कहीं मेरे अंदर बहुत भीतर दबी
मेरे बीते कल की अँधेरी यादों को
और चुभने वाले उन जज़्बातों को।
अपनी आदत के परदे को हटाकर
अपनी आँखों से फैसले
के मैल को हटाकर जिसदिन देखोगे
उस दिन शायद तुम देख पाओ
की मैं कितना अकेला था।

Friday, January 9, 2015

उम्मीद

तुम मेरी वो उम्मीद हो
जिसका हाथ थाम कर
मैं उस पार तक जाना चाहता हूँ।
तुम मेरी वो तलाश हो
जिसको हासिल करने के लिए
मैं खुद को भी खो देना चाहता हूँ।
तुम मेरा वो ख़्वाब हो
जिसको जीने के लिए मैं
हक़ीक़त से भी मुँह मोड़ लेना चाहता हूँ।
तुम मेरा वो गुनाह हो
जिसे अंजाम देने के लिए मैं
कितनी ही बार सज़ा पाना चाहता हूँ।

Thursday, January 8, 2015

तलाश

इस आग़ाज़ को अंज़ाम देना चाहता है ;
दिल ये तुझको पैग़ाम देना चाहता है। 
तुम न मिले तो फिर अधूरा ही रह जाऊँगा ;
ख़ुद को एक मुकम्मल आयाम देना चाहता है।
जाने कब से तुम्हारी ही तलाश थी दिल को ;
इस एहसास को एक नाम देना चाहता है।