मैं ये उम्मीद कतई नहीं रखता
की तुम समझ सकोगे मुझे-
मेरे सपनों को ;
मेरे खौफ को
और मेरे अंदर छुपे उस
गहरे सन्नाटे को।
तुम महसूस ही नहीं कर पाओगे -
कहीं मेरे अंदर बहुत भीतर दबी
मेरे बीते कल की अँधेरी यादों को
और चुभने वाले उन जज़्बातों को।
अपनी आदत के परदे को हटाकर
अपनी आँखों से फैसले
के मैल को हटाकर जिसदिन देखोगे
उस दिन शायद तुम देख पाओ
की मैं कितना अकेला था।
की तुम समझ सकोगे मुझे-
मेरे सपनों को ;
मेरे खौफ को
और मेरे अंदर छुपे उस
गहरे सन्नाटे को।
तुम महसूस ही नहीं कर पाओगे -
कहीं मेरे अंदर बहुत भीतर दबी
मेरे बीते कल की अँधेरी यादों को
और चुभने वाले उन जज़्बातों को।
अपनी आदत के परदे को हटाकर
अपनी आँखों से फैसले
के मैल को हटाकर जिसदिन देखोगे
उस दिन शायद तुम देख पाओ
की मैं कितना अकेला था।
No comments:
Post a Comment