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Wednesday, September 16, 2015

अन्यत्र

आज हम निकले ;
अपने घर से ;
ज़िंदगी ढूँढने।
सोचा मिले तो पूछूँगा -
क्या ख़ता हुई ;
जो यूँ ख़फ़ा हो मुझसे।
तमाम रास्ते तय किये ;
ये सोचकर -
कि कहीं तो बैठी होगी ;
मेरे इंतेज़ार में।
मनाऊँगा उसे इतना ;
कि पिघल जायेगी ;
मेरे मनुहार में।
जब शाम हो गयी ;
और हौसले भी थक गए।
लड़खड़ा गए हम ;
और कदम भी रुक गये।
निराश होकर उलटे कदमों से ;
लौट चले हम अपने घर को।
खाली हाथ लौटने लगे ;
निहारते गोधूली के अम्बर को।
जब घर पहुँचे तो ;
दिवावसान के उस समय में।
अपने ही घर के ;
उस अनछुए,
अनदेखे कोने में।
ज़िन्दगी मिली -
अपनी आख़िरी साँसें लेती हुई।
बोली कब से मैं तुम्हारा इंतेज़ार ;
इसी कोने में करती रही।
तलाशते रहे तुम मुझे अन्यत्र
और मैं तुम्हारे ही घर में मरती रही। 

Monday, September 14, 2015

चिंगारी

बेज़ान है, इत्मीनान है ;
फिर भी बेकरारी बाकी है।
राख़ हो गया हूँ भीतर तक ;
कहीं इक चिंगारी बाकी है। 

Tuesday, September 8, 2015

त्याग

क्षितिज में सिमटता सूरज ;
मानो एक बिंदु मात्र -
अपने अस्तित्व को खोता हुआ।
अपनी विशालता को पाकर ;
फिर उसी विशाल में विलीन होता हुआ।
यही कह रहा हो कि ;
भले ही उपलब्धि हो ;
ऊँचाई प्राप्त कर लेने में।
लेकिन मुक्ति तो ;
उस ऊंचाई को त्याग देने में ही है।