कहीं भीतर ही भीतर एक सर्द कोने में
मायूसी में सिमटे अरमानों को ;
अपनी इक आवाज़ की तपिश भर से ;
नया परवान चढ़ाती है।
जो कब का जीना भूल गया उस दिल को ;
साँसों से सराबोर कर जाती है।
ख़ुद को तलाश पाने की जाती उम्मीद में ;
मेरे वज़ूद को फिर से ज़िंदा कर जाती है।
पता नहीं अब तक कहाँ ढूंढ़ रहा था ;
तुम्हारे ख्याल भर ख़ुदा का एहसास करा जाती है।
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