कभी जानकर ;
कभी अनजाने में।
अपनों के बीच ;
या ज़माने में।
हम दूसरों की कहानियों के
किरदार बन जाते हैं।
उनके सच-झूठ,
सही-गलत के ;
भागीदार बन जाते हैं।
हमें लगता है ;
हमने अदायगी की है
अपने फ़र्ज़ की लेकिन ;
चुकाते हैं जितना ज़्यादा ;
उतना ही कर्ज़दार बन जाते हैं।
कभी अनजाने में।
अपनों के बीच ;
या ज़माने में।
हम दूसरों की कहानियों के
किरदार बन जाते हैं।
उनके सच-झूठ,
सही-गलत के ;
भागीदार बन जाते हैं।
हमें लगता है ;
हमने अदायगी की है
अपने फ़र्ज़ की लेकिन ;
चुकाते हैं जितना ज़्यादा ;
उतना ही कर्ज़दार बन जाते हैं।
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