एक वो भी सुबह हुआ करती थी
जब मम्मी लगभग खीजते हुए
पूरी आवाज़ में पुकारती थी-
"रविवार की सुबह भूख प्यास भी नहीं लगती क्या ?
कम से कम खाने के लिए तो उठ जाओ बिस्तर छोड़कर।"
अब तो ये दिन भी ;
कैलेंडर के बाकी दिनों की तरह ;
मुंह चिढ़ाता है।
छुट्टी की शक्ल में आता है
और यूँ फुर्र हो जाता है ;
मानो पिछला दिन ख़त्म ही नहीं हुआ हो कभी।
वो भी दिन था कभी जब
दादी बोलती थी -
"देखो ठण्ड में कैसे चेहरा सूख गया है !
आओ कड़ुआ तेल लगा देती हूँ। "
वो ठण्ड की धूप और दादी के खुरदुरे हाथ।
आज वो सब स्वपन के समान लगते है।
ज़िन्दगी के इन रास्तों पे चलते चलते सोचता हूँ ,
ये सफर आगे ही क्यों बढ़ता है ?
कभी पाऊज़ या रिवाइंड क्यों नहीं होता ?
और अगर नहीं होता तो मेमोरी में
ये सब क्यों स्टोर रहता है ?
आने वाले दिनों में टीस देने के लिये ?
जब मम्मी लगभग खीजते हुए
पूरी आवाज़ में पुकारती थी-
"रविवार की सुबह भूख प्यास भी नहीं लगती क्या ?
कम से कम खाने के लिए तो उठ जाओ बिस्तर छोड़कर।"
अब तो ये दिन भी ;
कैलेंडर के बाकी दिनों की तरह ;
मुंह चिढ़ाता है।
छुट्टी की शक्ल में आता है
और यूँ फुर्र हो जाता है ;
मानो पिछला दिन ख़त्म ही नहीं हुआ हो कभी।
वो भी दिन था कभी जब
दादी बोलती थी -
"देखो ठण्ड में कैसे चेहरा सूख गया है !
आओ कड़ुआ तेल लगा देती हूँ। "
वो ठण्ड की धूप और दादी के खुरदुरे हाथ।
आज वो सब स्वपन के समान लगते है।
ज़िन्दगी के इन रास्तों पे चलते चलते सोचता हूँ ,
ये सफर आगे ही क्यों बढ़ता है ?
कभी पाऊज़ या रिवाइंड क्यों नहीं होता ?
और अगर नहीं होता तो मेमोरी में
ये सब क्यों स्टोर रहता है ?
आने वाले दिनों में टीस देने के लिये ?
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