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Sunday, December 6, 2015

गुमाँ

आज तुमने फिर से ;
उसी पुरानी शिद्दत के साथ ;
मेरे ख्यालों के कैनवस पे घिर के।
अपनी छवि से मुझे ;
सराबोर कर दिया है।
जितनी ही बार ये गुमाँ होता है ;
कि अब तुम्हारा वज़ूद ;
मर गया मेरे अंदर।
उतनी ही बार ज़ाहिर होते हो ;
नयी शक्ल लेकर।
कभी आँसू बनकर भी ;
आँखों में ही जज़्ब हो जाते हो।
तो कभी लफ़्ज़ों में ढलकर भी ;
ज़ुबाँ के अंदर ही दम तोड़ देते हो।
तो कभी यूँ ही वीरान शामों में ;
आसमाँ पर खिंच जाते हो ;
उस टिमटिमाते तारे की तरह -
जो बस अपने होने का ;
एहसास भर करा सकता है।
 

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