कभी बेवजह के सवालों से;
तो कभी बेपरवाह ख्यालों से।
बिछ जाती हो मेरे आँगन में;
उजली चादर सी बाँहें पसारे।
कभी आगोश में भर लेती;
कभी ठुकरा देती गुज़ारिश सारे।
कभी बेवजह तो कभी जान बूझ कर;
बख़्श देती हो ज़न्नत या
चल देती ऑंखें मूंदकर।
ज़िन्दगी ! तुझे ढूंढता फिरता हूँ;
के एक दिन तो तुझे पाउँगा।
कभी तो मिलूँगा तुझसे;
और अपना बनाऊँगा।
मगर भूल गया इस सफर के हवश में ;
चलना है अख़्तियार पाना नहीं वश में।
हम सब तेरे ही तो हैं फिर;
तुझे कैसे अपना बनायेंगे ?
तू हमसफ़र ही है हरदम फिर;
और कहाँ तुझे पायेंगे ?
तो कभी बेपरवाह ख्यालों से।
बिछ जाती हो मेरे आँगन में;
उजली चादर सी बाँहें पसारे।
कभी आगोश में भर लेती;
कभी ठुकरा देती गुज़ारिश सारे।
कभी बेवजह तो कभी जान बूझ कर;
बख़्श देती हो ज़न्नत या
चल देती ऑंखें मूंदकर।
ज़िन्दगी ! तुझे ढूंढता फिरता हूँ;
के एक दिन तो तुझे पाउँगा।
कभी तो मिलूँगा तुझसे;
और अपना बनाऊँगा।
मगर भूल गया इस सफर के हवश में ;
चलना है अख़्तियार पाना नहीं वश में।
हम सब तेरे ही तो हैं फिर;
तुझे कैसे अपना बनायेंगे ?
तू हमसफ़र ही है हरदम फिर;
और कहाँ तुझे पायेंगे ?
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