मुझे ज़िंदा रखती है
तुम्हारी हर वो बात
जो तुम मेरे विरोध में कहते हो।
और शायद तुम्हे भी
आने वाले लम्हों का स्वाद
मीठा लगता हो
मेरी कड़वी और चुभती
नज़र सानियों के बाद।
एक दूसरे की कदर
हम दोनों से बेहतर
कोई नहीं समझ सकता
क्यूँकि हम दोनों ही ज़रूरतमंद हैं
एक दूसरे के सवालों के।
आदत पड़ चुकी है हमें
एक दूसरे के दिए ज़ख्मों के।
और एक दूसरे को बर्दाश्त करते करते
अब हम एक दूसरे को सुकून देने लगे हैं।
तुम्हारी हर वो बात
जो तुम मेरे विरोध में कहते हो।
और शायद तुम्हे भी
आने वाले लम्हों का स्वाद
मीठा लगता हो
मेरी कड़वी और चुभती
नज़र सानियों के बाद।
एक दूसरे की कदर
हम दोनों से बेहतर
कोई नहीं समझ सकता
क्यूँकि हम दोनों ही ज़रूरतमंद हैं
एक दूसरे के सवालों के।
आदत पड़ चुकी है हमें
एक दूसरे के दिए ज़ख्मों के।
और एक दूसरे को बर्दाश्त करते करते
अब हम एक दूसरे को सुकून देने लगे हैं।
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