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Saturday, November 15, 2014

बेवजह

जब कभी यूँ हीं तन्हा बैठे
बेवजह किसी ख्याल पे।

दिल तुम्हारा दुखने लगे
बरसों पहले के सवाल पे।

जब खामोशी में भी
कोई सदा सुनायी दे।

लगे किसी ने छू लिया
यादों की परछाईं से।

हवाओं के चलने में
शाम के ढलने में।

महसूस हो किसी की मौजूदगी।
अधूरी लगे बिना उसके ज़िन्दगी।

होंठो पे बिना बात कोई
मुस्कान बिखेर दे।

बरसों पहले की उसकी याद को
दिल से निकालने को दिल न करे।

तब ऐसा लगता है मानो
इतनी दूर घसीट कर
तो कभी बहला फुसला कर
लाये हैं संग जिसे वो कोई और ही है।

क्यूंकि खुद को तो हम
वहीँ कहीं छोड़ आये हैं।



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