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Friday, November 14, 2014

सुकून

आगंतुक !
तुम क्षितिज से फूटती 
प्रातः काल की 
रश्मि पुँज की तरह 
अलसायी अँधेरी धरती को 
ऊर्जावान कर गए। 
उसे भविष्य की 
उम्मीदों से भर गये। 
लेकिन जब तुम छोड़ गए 
अमावस के भरोसे 
तो उम्मीदों ने भी मुंह फेर लिया। 
अब रौशनी से ही डरता हूँ। 
और सुनसान अंधेरों में 
सुकून की साँसें भरता हूँ। 


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