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Wednesday, June 5, 2019

भीड़

एक भीड़ से निकल कर
दूसरी भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं।
चलो फिर से एक नया किरदार ,
एक नया कथानक , एक नया किस्सा बन जाते हैं।
बोलते-बतियाते इतनी दूर चल ही लिए
चलो अपनी ख़ामोशी से भी कुछ कह जाते हैं।
एक सुकून भरी रात , तारों से पटा आसमाँ ,
तुम, मैं और कहने को बहुत कुछ
ऐसे में क्यूँ न एक दूसरे से बिना कहे
सब कुछ समझ जाते हैं।
खुशियाँ , ग़म , उम्मीद , पछतावा
और सही गलत से परे -
उस मंज़र में खुद को खोकर
फिर एक बार खुद से मिल आते हैं।
चलो न इस भीड़ से कहीं दूर
अपनी एक अलग दुनिया बनाते हैं। 

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