ये वीरान आकाश
ये सुदूर फैली धरती
ये निर्बाध बहती बयार
मीलों फैली ये नदी
और निरंतर ऊष्मा देती ये ज्वाला।
क्या सचमुच इन्ही पंचतत्वों से बना है ये शरीर?
अगर सच है ये तो क्यों नहीं हम भी बड़े होकर बर्दाश्त कर पाते हैं ये खालीपन
इस वीरान आकाश की तरह ?
क्यों हमें सालता है अपनों से बिछड़ना,
उनसे दूर होना और उनसे महरूम होना?
क्यों नहीं हम भी सुदूर फैली इस धरती की तरह विस्तृत हो पाते हैं?
क्यों नहीं हो जाते हैं आँखों से ओझल ?
क्यों तलाशते हैं अपनों का साथ, उनका प्यार और समाप्त हो सकने लायक क्षितिज ?
क्यों नहीं हम भी गुजर जाते हैं निर्बाध
लोगों से मिलकर बिना दिलों में उनकी यादें संजोये-
निर्बाध निरंतर बहती इस बयार की तरह ?
क्यों नहीं हम भी बिना ज़ज्बातों के
ज़िन्दगी के सफ़र में छोड़ जाते हैं अपने पीछे यादों का कारवां ?
जैसे ये नदी बह जाती है बेलाग अपने किनारों से,
अपनी असंख्य घाटों, शहरों और सभ्यताओं से ?
क्यों नहीं हम भी लगातार प्रज्वलित रह पाते हैं
बिना परवाह किये औरों के जलने का ?
जैसे अग्नि की ये ज्वाला जला देती है
अपने पराये सभी को बिना भेदभाव के ?
इन्हीं पंचतत्वों से बनता है ये शरीर
और इन्हीं में विलीन हो जाता है एकदिन ।
फिर बीच में ये कौन सा सफ़र है
जिसमें ये निर्जीव, निर्भाव्, निराकार और निर्गुण तत्त्व
एक होकर इतने सारे भावों, ज़ज्बातों, रिश्ते-नातों के असंख्य बंधनों में बंध जाते हैं ?
ये सफ़र जिसे हम ज़िन्दगी कहते हैं
क्या यूं ही निर्जीव से सजीव
और सजीव से निर्जीव
होते रहने का कुचक्र नहीं है ?
Kya baat Sir :)
ReplyDeletelag raha hai ki duniya me dikhaun sabko.. ki dekhlo kiska comment mila hai aaj mujhe...
ReplyDeleteThanks for ur comment Yogi bhai...