वो कहते हैं कि हमने ज़िन्दगी से क्या पाया क्या खोया ?
करते हैं हिसाब कि किसने हमें हँसाया किसपे दिल रोया ?
हम कहते हैं गैरज़रूरी है कि हमारा भी किस्सा बने ;
भले किसी ने गौर ना फ़रमाया पर हम भी इस सफ़र का हिस्सा बने ।
जो गर बन ना पाए हिस्सा भी तो गम नहीं ;
हमसफ़र ना मिला दूर तलक फिर भी ऑंखें नम नहीं ।
हमने तो वास्ता रखा इस सफ़र से इसके मुसाफिरों से नहीं ;
मुसाफिरों को मंजिलें मिलती हैं इन रास्तों को नहीं ।
सफ़र में मंजिल ही पा लूँ तो बचता क्या है ?
रास्तों को गर ना जिया तो सफ़र में रहता क्या है ?
तो फिर पहचान लो क्या ज़िन्दगी के माने हैं ?
रात, सफ़र, हमसफ़र या सभी ये फ़साने हैं ।
इन फसानों को जिया करते हैं सभी ;
मीठी हो या कड़वी पिया करते हैं सभी ।
जायके कि उम्मीद में क्यूँ बर्बाद किया जाए इसका पीना ?
पीने में मज़ा लो मय में नहीं और सीख लो तुम भी जीना ।
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