डर क्या है?
आइये आज इस प्रश्न का हल ढूंढते हैं या अपनी एक कोशिश करते हैं। बाकी सभी भावों की तरह ये भी हमारे मन का एक भाव है, एक एहसास है। लेकिन ये एहसास बाकी एहसासों जैसे की प्यार, आनंद, ख़ुशी, उमंग, दुःख, इर्ष्या, लोभ, क्रोध वगैरह वगैरह से कई मामलों में जुदा होकर भी उनमे ही संलग्न है। जब हम खुश होते हैं तो भी क्या इस बात से इनकार कर पाते हैं की हमें डर है की ये ख़ुशी कहीं खो ना जाये या कुछ पलों की मेहमान ना हो। जब हम प्यार करते हैं तो इस बात का हमें हमेशा डर रहता है की कहीं जो हमें प्यारा है वो किसी और का न हो जाये या फिर हमसे बदले में उतना प्यार करे ही नहीं। कईयों का तो यहाँ तक मानना है कि प्यार का अंदाजा ही इस बात से लगाया जा सकता है कि आप उस वस्तु या व्यक्ति को खोने से कितना डरते हो। डर का एक पहलू और भी है। जब किसी घटना या व्यक्ति के बारे में हमारे मन में एक अनिश्चितता का भाव आता है कि अमुक व्यक्ति अमुक समय पर अमुक स्थिति में कैसी प्रतिक्रिया देगा? क्या वो हमारे मन मुताबिक होगा? ये अनिश्चितता का भाव भी एक डर को जन्म देता है।
डर के बहुत सारे पहलू हमारे लिए लाभदायक भी हैं जैसे कि ये हमें सजग करता है। हमें उन चीजों का क़द्र करना सिखाता है जो हमसे दूर जा सकती हैं। लेकिन ये डर अगर हमारा निर्देशक बन जाये तो ये बहुत सारी ऐसी चीजें भी करवा सकता है या करने से रोक सकता है जिसके लिए हमें ज़िन्दगी भर पछतावा होता रहे। डर का नहीं होना जहाँ वैराग्य या गैरजवाबदेही का सूचक है वहीँ अधिक डर का होना आत्मविश्वाश की कमी और अत्यधिक मोह का सूचक है।
इसलिए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं की डर एक ऐसा भाव जिससे हम पीछा नहीं छुड़ा सकते लेकिन हाँ एक बात है की अगर हम डर को अपने फायदे में इस्तेमाल करें तो ये हमारे लिए एक सार्थक एहसास है। या यूँ कह लीजिये की हम डर को इस्तेमाल की वस्तु बनाये न की इसे हम अपना इस्तेमाल करने दें तो निश्चय ये हमें नयी बुलंदियां दिखा सकता है। एक बच्चे को आमतौर पर परीक्षा का डर होता है। ये डर अगर सही मात्रा में हो तो बच्चे को अधिक से अधिक पढने के लिए बाध्य करेगा लेकिन जैसे ही ये डर बच्चे पर हावी हो जाये तो ये पलायन यहाँ तक की ख़ुदकुशी के लिए भी बाध्य कर सकता है।
डर के बारे में फिर कभी लिखूंगा विस्तार से। तब तक आपलोगों का अपना अनुभव अगर जान सकूँ तो इस विषय पर और भी ठोस कुछ सोच सकता हूँ।
आपके विचारों की प्रतीक्षा में...
ek darr ki stithi woh bhi hai... jaha aapke paas kuch nahi hota.. aur phir bhi na jaane kya khone ka darr hota hai....
ReplyDeleteIsko agyat ka bhay kahte hain... Ye darr anishchit bhi hai aur iska koi roop bhi nahi hai.. Ye wo wali sthiti hai ki aapko ladai to ladni hai lekin dushman ka pata nahi...
ReplyDeleteWell thought... Gave me more dimension to the concept.. Thanks